Monday, January 26, 2009

परिचय

महावीर फौजी का जन्म 01 दिस. 1944 को ग्राम हमीरपुर पो0 भगवनतनगर जनपद उन्नाव, उ0 प्र0 में एक संयुक्त दलित परिवार (पासी) में सम्पन्न हुआ।
आपके जन्म के पूर्व ही आपके जीवन में कलह का प्रकोप आ चुका था। पिताजी का पारिवारिक त्याग माता का विद्रोह और संयुक्त परिवार का विद्यटन आपकी जीवन शैली प्रतिद्यातक सिद्ध हुई।
आपकी शिक्षा अभिरूचि का विचार 15 साल की अल्पआयु में गवना की चपेट में आकर चैपट हो गई मगर अल्पआयु में ही बिमारी की अवश्था में पत्नी के देहावसान के पश्चात पुनः शिक्षाप्रवेश जारी किया मगर पारिवारिक कलह और स्कूली छात्रों का कलह असहनीय होने की वजह से हाईस्कूल की परीक्षा अपूर्ण छोड़ दी सन् 1965 की 23 अक्टूबर को मातृभूमि की रक्षा हेतु स्वयं को समर्पित किया। सन् 1970 में भोपाल सेकेण्ड्री बोर्ड से हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण कर सन् 1977 से 1989 तक सेना की सेवा कर एक क्लर्क की हैसियत से करते हुये सेवानिहित हो गये।
ज्ञातव्य हो कि वैसे तो आपकी जीवनी का परिचय एक जटिल समस्याओं से भरा हुआ दस्तावेज से साबित होता है, जैसे की आपने संधर्षपूर्वक व्यतीत करते हुये अनेक रचनाओं को अपनी लेखनी द्वारा जन्म देकर एक और कीर्तिमान स्थापित करने के लिये शायद वचनबद्ध है।
अंततः आपका यह कथन है कि अफसोस हम भारतीय हैं और हम भारत पर गर्व भी करते है मगर भारतीयता पर नहीं?

दो शब्द

सेक्शन थम, आधे दाऐं, आधें बायें बाकी मेंरे पीछे क्विक मार्च!
यह हमारी संस्थागत नीति का एक काबिले-तारीफ नमूना है, साथ संनग्न हम अंगे्रजो के जमाने के जेलर हैं, जब हम नहीं सूधरे हैं तो तुम कैसे सुधरोगे वैगरहा। यह शोले पिक्चर के संवाद जैसे ही कुछ दृश्य और मुहावरे सारे संसार में (शोले जहां भी चली) हर इंसान की जुंबान पर अनायास ही आते गये और आज भी चरितार्थ है।
वास्तव में हम सठिया गये लेकिन हममे भी बचपनापन और सीख ही आज तक किसी पायदान ने मुहैया ही नहीं करवाई जिसकी कि कल से आज और आज से कल को भी जरूरत थी, मगर शायद उन्हे इसकी जरूरत ही नहीं महसूस हुई जो कि इस भारतीयक को आदर्श की नजर से देखने और सुखमय बनाने के स्वप्न दर वचनबद्ध रहें हैं।
वरना क्या उन देशभक्त वीरो शहीदों और महापुरूषों की तस्वीरें सर से ऊपर दिवारों से टाँगकर जोशोकथन और आहवान प्रति जागरूक होकर उनके बताये पथ पर चलकर हमे उनके द्वारा दी सीख पर स्वयं चलकर बताते तो क्या हम आज उस श्रेणी में हाजिर जवाब होते जिसे कि भ्रष्ट राजनीति का दर्जा विश्व आकड़ा भी दे चुका है। और जिससे यह शोले का संवाद बिल्कुल सटीक बैठते हुये हमे प्रतीत हो चुके हैं।
जिस देश के नागरिक को सम्पूर्ण रूप से अपने देश का इतिहास हीन मालूम हो उस देश की नीयत का अंदाजा अणुढ़ भी लगाने में पीछे नहीं रहेगा।
संकेतः कहने को भारतीय है और हमे भारत माँ पर गर्व है मगर भरतीयता पर नहीं, क्यांेकि यह बेजार बस्ती है और इसमे

हम आबाद-ए मरहूम बस्ती में,
मजरूह-ए अमन तलाश सिद्दत हुये,
ख्वाब सारे कसीदों की तरह गुनते रहो
वक्त आखिर नसीबे हाथ खली रूखसते!

धन्यवाद

महावीर फौजी
ग्राम हमीरपुर पो0 भगवन्तनगर
जनपद - उन्नाव (उ0 प्र0)

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बाबा नामदेव गांव की बुजुर्गो की विनती में से एक थे। अक्सर लोग उन्हे पुरखा के नाम से भी याद किया करते, उन्हे सभी आदर की भावना से देखते और वह सभी छोटे बड़े का सम्मान स्वीकारते हुये उनका सम्मान करतें हैं, बचपन में ही उन्हे कटुता और व्याभिचार की आचार संहिता से परहेज था वह किसी के द्वारा कटु बोले हुये वचनो का बड़ी सहजता और नम्रता केे साथ जवाब दिया करते थे। शायद ऐसी ही कुछ विशेषतायें थी जिनकी वजह से वह पास-पड़ोस की पहुंच तक आदर्श पुरूष के रूप में जाने माने जाते थे।
जानकार सूत्रो के अनुसार यह सभी जानते थे कि बाबा बाल्यावथा से ही निर्गंुण जीवन यापन करने का संकल्प ले चुके थे, और उसे आपने बाखूबी निभाते हुये अपनी पराकाष्ठा के आखिरी छोर में आ चुके थे मगर आज-तक उनके कुशल व्यवहार किसी ने व्याभिचार संहिता का शक उनपर नहीं किया। और ना ही कभी उन्होने किसी को गलत सलाह देकर उनकी गृहस्ती में खलनायक की भूमिका ही निभाईं हो।
बाबा नामदेव आजकल अक्सर ही अपने मितव्ययी परममित्रों सये कहा करते थे , कि हमे ऐसा कुछ महसूस होने लगा है कि हमारे जीवन का आखिरी पड़ाव हमारे नजदीक आ चुका है, और हम हैं कि हाथ हाथ धरे बस वही रोटी दाल और इसके सिवा और किसी धुन की तरह ज्यादा ध्या नही नहीं दे पा रहें हैं, जबकि मेरे पास ऐसा मौका आ चुका है कि अब हम अपना पूरा समय सबकुछ त्यागकर ईश्वर को समर्पित हो जाँऊ।
उनके इस प्रकार के विचारो से बहुधा सभी वशीभूत होकर उनकी काफी प्रसंशा करते और उनको अपना प्रिय परम भक्त समझाने की भावना प्रकट कर कबीर के दोहे साखी भजन और रामायण के पाठ में वशीभूत अपने पक्ष में कर उनका उत्तराधिकारी बनने की कोशिश में उनकी खातिरदारी का सिलसिला देवपूजा के समान चल बसा।

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बाबा ने जीवन और समाज के उतार-चढ़ाव के कई प्रकाश वर्षो का अनुभव समझ रखा था। वह अपनी छोटी सी पूँजी को वशीयत नामे की बातकर प्रत्येक को मानसिकता के विचार और विकास प्रति अक्सर चुनिन्दा व्यक्ति (अपने विचारो लायक) खोजते रहतें हैं मगर उनके सामने कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं आया जिसे कि वह अपनी छोटी सी पूँजी को अपनी इच्छानुसार आदर्श व्यक्ति को सौप इससे मुक्ति पाकर अपनी सुकर्म शालीन पुण्य यात्रा शुरू कर सकें।
अनायास ही लोग असमंजस में पड़ गये जब बाबा ने यह उद्घोष किया कि हम अपनी छोटी सी पूँजी का वसीहतनामा करवा चुके हंैं और इसका ऐलान अमुक दिन अमुक समय में करने का संकल्प ले चुके हैं कृप्या सभी आप हमारे इस योगदान प्रति आमंत्रित हैं।
बाबा का यह कथन सुन सभी असमंजस में पड़ गये लोग जो कि इनकी हाव भाव की सेवा करते वह अनायास ही उनसे विमुख होने लगे मगर स्वाभाविक इंसान निष्ठा से उनकी सेवा में विलीन होते हुये भी कभी उनसे वशीहतनामा प्रति किसी प्रकार का सवाल तलब नहीं मंागा और होते करते आखिर वह दिन और घड़ी भी करीब आने लगी जिसका की सभी को इंतजार था।
अस्मंजस भरा आशाविहीन परपंच शुरू हो चुका था लोग इच्छा अनिच्छा के गिरदाब में गिरे हुये बाबा के मकान के सामने आके और कहीं न कहीं अपना स्थान सुनिश्चित कर एक दूसरे से चुपड़ी खरी खोटी बातों की भड़ी लगाते हुये बाबा के सम्मान प्रति अपने कान खड़े रहे, बाबा सभी सज्जनो की तरह मकान से बाहर आते ही एक सरसरी नज़र दौड़ाते हुये एक स्थान पर बैठते हुये कहा भाई बहनो बच्चो बुजुर्गो सबको हमारा सादर राम राम सीता राम स्वीकार हो।

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बाबा ने पुनः सभी के चेहरो को भांपते औार हाजिरी दर्ज करते हुये कहा- हम आप सभी के आगमन प्रति खुशी का इज़हार प्रकट करते हुये आप सभी का ऋणी हुआ और यह ऋण इस जीवन में क्या जन्म जन्मांतर भी भुगत नहीं पाओगे। हाँ कुछ हद तक इस थोड़ी सी धरोहर और पूँजी के जरिये कुछ उद्धार हो जाये यह बात भी हम नहीं मानते कारण की आप सभी जानते हैं कि बचपन से ही हम आप सभी के खानदानों के सहयोग से ही आज इ मंच पर पहुचे हैं, जहां से आगे बढ़ने के लिये मुक्ति मार्ग की तलाश की है, और उसी के उपलक्ष में हमने इस पूंजी और धरोहर की वशीयत नामे का ऐलान कुछ अर्सा पहले कर चुके थे और वह दिन और समय अब आपके और हमारे बीच चन्द्र धड़ियों का ही अवशेष पह गया है, इसके बाद पता नहीं कि कब नामदेव नाम का यह व्यक्ति इस बस्ती में आता है कि नहीं इसकी तो खबर ईश्वर की जगह और किसको हो सकती है।
हमारे अपने अनुभव के अनुसार हमने जीवन के अनेक प्रकाश वर्षो के समान अनेक प्रकार के कष्ट और सुख झेले हैं, मगर हमे जितना आनन्द कष्टो की अनुभूति से प्राप्त हुआ है वह सुख भी नहीं और यही वजह है कि आज भी मेरे हृदय में कष्ट की वेदना समाहित है, और इसी के चलते हुये ही हमने अपनी वसीयत जिस प्रकार से तैयार करवाई थी उसमें वसीयती के नाम का स्थान खाली ही छुड़वा दिया, क्योंकि यह वसीयत का निर्णय आप सभी को ना कि मुझे अकेले करना था, यह आप पर निर्भर है और इसे आप सभी लाटरी द्वारा निकालकर इसका निर्णय स्वंय से स्वंय में ही कर लें, जिससे कि आने वाले समय में कोई किसी पर उंगली उठाकर गलत बयानबाजी न कर सके।
सभी की आशाओं पर मानो गाज पड गयी हो सभी एक दूसरे की तरफ देखते ओर कागज के छोटे-छोटे टुकड़ो में अपना नाम दर्ज कर एक टोकरी में रखने लगे। अतः यह प्रक्रिया पूर्ण होते ही भैरव ने कहा- किशनलाल।
किशन- जी दादा जी।
भैरव- हमारे विचार से ेसबके नाम की पर्चियां इस टोकरी मेें आ चुकी हैं।
किशन- जी हाँ, भाई जिसने अपने नाम की पर्ची इस टोकरी में नहीं डाली वह अब भी डाल दे’

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पश्चात इसकी सभी पर्चियों को एक साथ मिलाते हुये भैरव ने कहा बच्चा इधर आओं। बच्चे के समीप आते ही उन्होने कहा- इससे एक पर्ची उठाओ और बाबा को दे आओं।
भैरव के कथनानुसार बच्चे ने एक पर्ची टोकरी से उठाकर बाबा के पास जाकर बोला- बाबा जी यह लो पर्चा।
बाबा- लाओं बच्चा खुश रहो, बेटा किशन इधर औओं ओर इसको खोलकर देखो की किस भाग्यशाली के पक्ष में छोटी सी पूँजी गई है। किशन पर्ची बाबा के हाथ से लेकर खोलते ही चैकते हुये कहा-बाबा जी, इसमें तो श्याम उबहादुर पुत्र किशनलाल लिखा है।
बबा मुस्कुराते हुये कहा है- हूँ तो क्या गलत लिखा है।
बाबा के इस प्रकार से कहने पर सभी ठहाका मारकर हसने लगे और बाबा वसीहत नामा के कागजात श्याम को सौपते हुये कहा-पोते श्याम इस जायजाद की बड़ी लम्बी कहानी है-जैसे की तुम्हारी अपने पिता, पुरखो की जयायजाद की, इसे अपनी आत्मा से अधिक श्रेय देना ‘खुश रहो’।
श्याम-जी दादा जी आपका हुक्म सर आंखो पर।
बाबा-शाबास हमे तुमसे यही आस थी।
बाबा कितने भले और बस्ती के चहेता थे यह उनके प्रस्थान से ही झलकने लगा था। वह ज्यों भरी आंखो से अपनी चैखट को आखिरी नत नमः कर चले कि अनायास ही सबकी आंखे छलकने लगीं, मगर बाबा ने पुनः मुड़कर देखना मुनासिब न समझा अपने पथ पर अग्रसर ही रहें। बाबा नामदेव बस्ती का भ्रमण करते हुये और सभी को आदर सत्कार देते हुये और स्वीकारते हुये ज्यों ही राय साहब की कोठी के सामने से आते ठहाके सुने वह चैकन्ने होकर बड़े गौर से उनके अल्फाज सुनते सुनाते कोठी की तरफ बढ़ते हुये कहा कि ‘राय साहब राम राम’ दीनानाथ राम आवाक होते हुये उनकी तरफ देखते हुये कहा-राम राम भाई नामदेव सुना है कि......।

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उनकी आंखो की तरफ देखते हुये बाबा नामदेव ने कहा- हाँ राय साहब जो कुछ आपने सुना वह सही और सच ही सुना है, मैने अपनी पूँजी जायजाद लाटरी द्वारा परिणाम निकलवाकर किशनलाल के पुत्र श्यामलाल के नाम वसीहत कर अब बाकी का समय देश भ्रमण और ईश्वर की उपासना में व्यतीत करते हुये हो सकता है कि अगर खुदा न खास्ता कभी अपनी चैखट और इस बस्ती में पैर रंखू यह तो आने वाला समय ही बतायेगा राम राम!
दीनानाथ राय ने उनके इस स्वभाव प्रति आभार प्रकट करते हुये कहा भाई कुछ आप कुछ कर गुजर रहें हेैंउसके विषय पर हम कुछ नहीं कहना चाहते हैं, मगर हाँ इतना अवश्य कहूंगा कि सभी कभी भूले भटके या फिर किसी प्रकार की परेशानी आने पर या फिर स्वेच्छा से आप अपनी बस्ती और पुरखों की चैखट पर दस्तक देना चाहते हो, उस हालत में हम आपका पूरा सहयोग करने के लिये ततपर रहेंगे,
हमारे जीवन मेें हमेशा ही आपके लिये एक उचित स्थान और भविष्य में भी यह स्थान आपके लिये कायम रहें राम राम!
बाबा-राम राम राय साहब भगवान आपको खुश रखे।
दीनानाथ राय अपने पुरखो के द्वारा हासिल की गई मुस्लिम और अंग्रेजी शासको तालुकेदार और राय साहब के खिताब से मशहूर आपकी खासी रियासत का मालिकाना हक रखते थे। आपकी जायजाद से हजारो गांव वासियों को रोजी और रोटी मिलती थी। राय साहब के यहाँ लेन देन का कार्यक्रम वहीं पुरानी बुजुर्गी हैसियत पर ही आघारित था।
उनके हितैषी मजदूरो और कर्मचारियों को अचानक ही अगर किसी प्रकार की आपदा का सामना पड़ जाये इस हालत में बड़ी मीन मेख पश्चात पड़ताल पक्के सक्कड़ के सथ पूँजी या अन्य प्रकार की सेवाप्रति जागरूक होते।
पूर्वजो की प्रथा के अनुसार राय खानदान में मजदूरो और बंधुवा मजदूरो की कूछ मजदूरी का अंश आजकल के वायदों पर भुगतान कर बाकी हिसाब नगद के आधार पर प्रत्येक तिहायी में मुहैया कराया जाता था। इस सिलसिले को प्रत्येक व्यक्ति स्वीकार नहीं करता था मगर सांप के सामने दीपक नहीं चलता।