Monday, January 26, 2009

पेज 9

बस्ती में बीडीसी की हैसियत से काका भैरव के दरबार में अक्सर ही परपंच का जखीरा लगा रहता था- अक्सर ही मौजे गांव बस्तियों के हर पहल की चर्चाऐं हुआ करती थी, उनकी कभी खोज के विषय में वार्तालाप होती मगर मामला अन्ततः टाय टाय फिस्स हो जाने के पश्चात अन्य किसी मत पर चर्चा शुरू हो जाती मगर वहीं राशन पर भाषण दो वाजिब लगते लेकिन भाषण पर राशन चाहि प्रति धटी कौन बांधे दो चार हसीं के गुबबारे छोड़ एक दूसरे का मुंह ताकते पहले आपके सिवा का परिचय देते मगर विचारनीय हालत में उंगलियो से जमीन में खिचमिताते हुये ही रह जाते कोई साहस कर यह नहीं कह पाता कि हाँ अमुक बात पते की है इस पर कुछ कार्यवाही करने की जतन क्यों न कि जाये यह सब ध्यान में रखते मक्खन में मक्खन लगाने की कोशिश करते हुये कहा- भैया बात तो पते की है। कि और तो सब छोड़ हमारे पेट का काला जो राशन हमे सरकार कोटे के रूप में हर गरीब इंसान को कार्ड पर देती है वह तक नदारद रहता है, भला यह भी कोई बात हुई।
कल्लू- हाँ भाई मक्खन बात तो पते की कहते हो, इसमें रस भी है मगर क्या इसको हम आगे तक बढ़ाने में सक्षम हैं।
भैरव-नहीं भाई यह टेढ़ी खीर है अभी कल के अखबार में ही एक बात छपकर बाहर आयी है। उसमें छपा था कि एक कोटेदार के राशन न देने पर गांव वालो ने उसके प्रति जिला स्तर पर फरमान जारी किया था और नतीजा ओफ!
दुखी- नतीजा भाई ।
भैरव-उक जान गोली का शिकार हो गयी।
मक्खन- राम-राम चोरी और सीनाजोरी भैया शासन!
भैरव- सुना है अभी तक एक आई उतर ही नहीं दर्ज हुई।
दुखी- हुंह समझा।
कल्लू- हुंह समझा इस देश का राम ही मालिक अब तो हर तरफ वहीं- क्या कहे क्या न कहें, कहें तो जहमत से गिरे। थोड़े में गुजारा होता है कि संज्ञा देकर आज का कुढ़ता इंसान बुदबुदाकर जी रहा है, उसके विषय पाये से प्रत्येक उपरी कड़ी का इंसान अवगत है मगर शायद वह सख्त कदम उठाने पर मजबूर हैं क्यो, इस मद से परिव्यक्त होते हुये किशन ने राय साहब से कहा- रायसाहब राम राम।

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