Monday, January 26, 2009

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बाबा नामदेव गांव की बुजुर्गो की विनती में से एक थे। अक्सर लोग उन्हे पुरखा के नाम से भी याद किया करते, उन्हे सभी आदर की भावना से देखते और वह सभी छोटे बड़े का सम्मान स्वीकारते हुये उनका सम्मान करतें हैं, बचपन में ही उन्हे कटुता और व्याभिचार की आचार संहिता से परहेज था वह किसी के द्वारा कटु बोले हुये वचनो का बड़ी सहजता और नम्रता केे साथ जवाब दिया करते थे। शायद ऐसी ही कुछ विशेषतायें थी जिनकी वजह से वह पास-पड़ोस की पहुंच तक आदर्श पुरूष के रूप में जाने माने जाते थे।
जानकार सूत्रो के अनुसार यह सभी जानते थे कि बाबा बाल्यावथा से ही निर्गंुण जीवन यापन करने का संकल्प ले चुके थे, और उसे आपने बाखूबी निभाते हुये अपनी पराकाष्ठा के आखिरी छोर में आ चुके थे मगर आज-तक उनके कुशल व्यवहार किसी ने व्याभिचार संहिता का शक उनपर नहीं किया। और ना ही कभी उन्होने किसी को गलत सलाह देकर उनकी गृहस्ती में खलनायक की भूमिका ही निभाईं हो।
बाबा नामदेव आजकल अक्सर ही अपने मितव्ययी परममित्रों सये कहा करते थे , कि हमे ऐसा कुछ महसूस होने लगा है कि हमारे जीवन का आखिरी पड़ाव हमारे नजदीक आ चुका है, और हम हैं कि हाथ हाथ धरे बस वही रोटी दाल और इसके सिवा और किसी धुन की तरह ज्यादा ध्या नही नहीं दे पा रहें हैं, जबकि मेरे पास ऐसा मौका आ चुका है कि अब हम अपना पूरा समय सबकुछ त्यागकर ईश्वर को समर्पित हो जाँऊ।
उनके इस प्रकार के विचारो से बहुधा सभी वशीभूत होकर उनकी काफी प्रसंशा करते और उनको अपना प्रिय परम भक्त समझाने की भावना प्रकट कर कबीर के दोहे साखी भजन और रामायण के पाठ में वशीभूत अपने पक्ष में कर उनका उत्तराधिकारी बनने की कोशिश में उनकी खातिरदारी का सिलसिला देवपूजा के समान चल बसा।

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