Monday, January 26, 2009

पेज 6

तिहाई का गल्ला पानी तैयार होकर कोठियों में ठूस दिया गया था और सभी मजदूर तथा खेतिहर मजदूर अपनी मजदूरी के गल्ले के हिसाब की अपने कागज लेकर सुबह से ही राय साहब के आहाते के चक्कर काटते हुये अपने हिस्से का गल्ला लेते हुये राय साहब तथा मुंशी मुशद्दियों से घट-बढ़ की शिकायत कर उनका ध्यान पुर्नविचार के लिये करते मगर कुछ ठील गुजारी पश्चात कुछ और गल्ला देकर सभी को मुंह देखी के अनुसार वापस भेजकर शांति की सांस लेते और मजदूर अपनी बस्ती दबाते हुये सखसत्त कर देते।
दीनानाथ राय एअहाते में चहलकदमी पर कुछ शोचनीय मुद्रा में विचर रहे थे कि उनके मोबाइल ने शोर मचाना शुरू कर दिया- ‘जिये तो जिये कैसे बिन आपके’ सुनते ही राय ने मोबाईल स्विच आॅन करते हुये कहा- हैलो’ राय दीनानाथ हियर।
दीपक राय- पिताजी चरण स्पर्श, मै दीपक कुमार अपने हाॅसटल से बोल रहा हूॅं।
राय-ओह दीपक खुश रहो बेटा तुम्हारी डाक्टरी की पढ़ाई कैसी चल रही हैं।
दीपक- अच्छी चल रही है पिताजी।
राय- हाँ बेटा बोलो।
दीपक- जी कुछ नहीं बस ऐसे ही कुछ।
राय- ऐसे ही कुछ मै समझा नहीं,
ओह समझा कही कोई ऐसा वेसा चक्कर यानि की शहनाई वगैरह की जश्न या झूम का तो।
दीपक- ओह पिताजी आप तो जानते हैं कि---।

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