Monday, January 26, 2009

पेज 8

श्याम-पिताजी गल्ला तो मिल रहा था लेकिन।
किशन- ओह समझा यह तो कम देना एहसान जताना उस खानदान की पुरानी आदत है बेटे जा भी दे रहे थे तुम्हे ले लेना चाहिये था। आओ चले हम साथ चलते हैं।
श्याम- नहीं पिताजी यह बात नहीं बात और भी कुछ है।
किशन- और क्रूा बात हो सकती है।
श्याम- नहीं दादा नामदेव की वसीहत जो हमारे नाम से हो चुकी है वह उन्हे खाये जा रही है।
किशन- उस वसीहत पर उनको क्या तकलीफ और सैकड़ो वादे के कास्तकार और राय साहब कहलाने पर भी उनको संतुष्टि नहीं प्रापत होती है क्या जोकि थोड़ी सी कास्तकारी और मकान वह बेचारे बड़ी सूझ-बूझ के साथ किसी को वसीयत कर यहाँ से प्रस्थान तो कर गये लेकिन शायद उनके मंसूबो में पानी ही फेर गये, तभी तो हूँ आओ चले।
यह वृतानत किशन की पत्नी राधिका दरवाजे और छोटे बड़े बच्चो के साथ बतियाती हुई सुनकर अपनी बत्तीसी मसोस कर रही थी।
किशन बमुश्किल इधर उधर की दौड़-धूप और मजदूरी की आमदनी तथा अपनी कास्तकारी के उत्पादन से अपने परिवार का निर्वाहन कर बच्चे को शिक्षा के मामले में अग्रिम श्रेणी पर नही ंतो मध्यम दर्जे पर लाने की सोच बनाकर चलता हूँ श्याम को नौकरी पेशा लायक शिक्षा हासिल करवाई। मगर नौकरी के नाम पर रिश्वतखोरी के चलते उसे साक्षातकार पश्चात हरी झंठी का सामना करना पड़ता, इसलिये वह अपने भविष्य विकल्प प्रतिदादा नामदेव को करना पड़ता इसलिये अ बवह अपने भविष्य और अपने दोनो को जोड़कर कुछ नये उत्पादो के प्रति जागरूक होकर अपने नये विकल्प के प्रति लालायित होते हुये अपने भाईयों अबौर बहन स्नेहा की शिक्षा दिक्षा प्रति अधिक ध्यान देने प्रति संकल्पबद्ध हो चुका था।

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