बाबा ने पुनः सभी के चेहरो को भांपते औार हाजिरी दर्ज करते हुये कहा- हम आप सभी के आगमन प्रति खुशी का इज़हार प्रकट करते हुये आप सभी का ऋणी हुआ और यह ऋण इस जीवन में क्या जन्म जन्मांतर भी भुगत नहीं पाओगे। हाँ कुछ हद तक इस थोड़ी सी धरोहर और पूँजी के जरिये कुछ उद्धार हो जाये यह बात भी हम नहीं मानते कारण की आप सभी जानते हैं कि बचपन से ही हम आप सभी के खानदानों के सहयोग से ही आज इ मंच पर पहुचे हैं, जहां से आगे बढ़ने के लिये मुक्ति मार्ग की तलाश की है, और उसी के उपलक्ष में हमने इस पूंजी और धरोहर की वशीयत नामे का ऐलान कुछ अर्सा पहले कर चुके थे और वह दिन और समय अब आपके और हमारे बीच चन्द्र धड़ियों का ही अवशेष पह गया है, इसके बाद पता नहीं कि कब नामदेव नाम का यह व्यक्ति इस बस्ती में आता है कि नहीं इसकी तो खबर ईश्वर की जगह और किसको हो सकती है।
हमारे अपने अनुभव के अनुसार हमने जीवन के अनेक प्रकाश वर्षो के समान अनेक प्रकार के कष्ट और सुख झेले हैं, मगर हमे जितना आनन्द कष्टो की अनुभूति से प्राप्त हुआ है वह सुख भी नहीं और यही वजह है कि आज भी मेरे हृदय में कष्ट की वेदना समाहित है, और इसी के चलते हुये ही हमने अपनी वसीयत जिस प्रकार से तैयार करवाई थी उसमें वसीयती के नाम का स्थान खाली ही छुड़वा दिया, क्योंकि यह वसीयत का निर्णय आप सभी को ना कि मुझे अकेले करना था, यह आप पर निर्भर है और इसे आप सभी लाटरी द्वारा निकालकर इसका निर्णय स्वंय से स्वंय में ही कर लें, जिससे कि आने वाले समय में कोई किसी पर उंगली उठाकर गलत बयानबाजी न कर सके।
सभी की आशाओं पर मानो गाज पड गयी हो सभी एक दूसरे की तरफ देखते ओर कागज के छोटे-छोटे टुकड़ो में अपना नाम दर्ज कर एक टोकरी में रखने लगे। अतः यह प्रक्रिया पूर्ण होते ही भैरव ने कहा- किशनलाल।
किशन- जी दादा जी।
भैरव- हमारे विचार से ेसबके नाम की पर्चियां इस टोकरी मेें आ चुकी हैं।
किशन- जी हाँ, भाई जिसने अपने नाम की पर्ची इस टोकरी में नहीं डाली वह अब भी डाल दे’
Monday, January 26, 2009
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