राय- हाँ बेटा जानता तो सबकुछ हूँ मगर आने वाले कल के वक्त से नावाकिफ हूँ और वैसे भी तुम तो जानते हो कि हम अपने खनदान के लिये कोई भी काम अपनी हैसियत और मर्यादा को ध्यान में रखते हुये ही आगे कदम बढ़ाने की कोशिश करते है, इस वजह से भी हम तुम्हे!
दीपक- पिताजी मै सबकुछ समझता हूँ। आप इन बातो से निशाखातिर रहे, मै कोई ऐसा वैसा काम नहीं करूंगा जिससे की आपकी हैसियत पर किसी प्रकार की आंच आये और फिर आप तो जानते ही हैं कि आज का दीपक ही तो आपके खानदानी चिराग को रोशन करने वाला एक डाक्टर बेटा दीपक ही तो है। वह अपने हिसाब से ही कोई कदम उठायेगा।
राय-हाँ दीपक मुझे तुमसे कुछ ऐसी ही उममीद तो है मगर कभी कभार हम असमंजस की स्थिति में आकर पता नहीं क्या से क्या सोचने लगते हैं, और वैसे भी तुम जानते हो कि तुम्हारे मंगलमय रिश्ते पश्चात हमे तुम्हारी बहन।
दीपक- ओह आई सी ये तो मै भूल हीं गया था कि पुष्पा के क्या हाल हैं।
राय- ठीक है अब तो घर पर ही रहती है।
दीपक-आगे अगर और कुछ, खैर छोड़िये उसके रिश्ते करा सिलसिला जारी करें आप मेरी चिंता न करे मै ठहरा लड़का।
राय- हाँ ऐसा ही कुछ सोच रहा था ।
दीपक- अच्छा पिताजी नमस्ते- माता जी को मेरा प्रणाम कहना।
राय- खुश रहो।
राय साहब की भाव भक्ति से असंतुष्ट श्याम बहादुर ज्यों ही अपने दरवाजे के सामने खाली पठली और बोरी लेकर पहुचा किशन ने उसे देखते ही कहा- श्याम क्या हुआ यह खाली पल्लो और बोरी, क्या गल्ला नहीं मिला।
Monday, January 26, 2009
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