Monday, January 26, 2009

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उनकी आंखो की तरफ देखते हुये बाबा नामदेव ने कहा- हाँ राय साहब जो कुछ आपने सुना वह सही और सच ही सुना है, मैने अपनी पूँजी जायजाद लाटरी द्वारा परिणाम निकलवाकर किशनलाल के पुत्र श्यामलाल के नाम वसीहत कर अब बाकी का समय देश भ्रमण और ईश्वर की उपासना में व्यतीत करते हुये हो सकता है कि अगर खुदा न खास्ता कभी अपनी चैखट और इस बस्ती में पैर रंखू यह तो आने वाला समय ही बतायेगा राम राम!
दीनानाथ राय ने उनके इस स्वभाव प्रति आभार प्रकट करते हुये कहा भाई कुछ आप कुछ कर गुजर रहें हेैंउसके विषय पर हम कुछ नहीं कहना चाहते हैं, मगर हाँ इतना अवश्य कहूंगा कि सभी कभी भूले भटके या फिर किसी प्रकार की परेशानी आने पर या फिर स्वेच्छा से आप अपनी बस्ती और पुरखों की चैखट पर दस्तक देना चाहते हो, उस हालत में हम आपका पूरा सहयोग करने के लिये ततपर रहेंगे,
हमारे जीवन मेें हमेशा ही आपके लिये एक उचित स्थान और भविष्य में भी यह स्थान आपके लिये कायम रहें राम राम!
बाबा-राम राम राय साहब भगवान आपको खुश रखे।
दीनानाथ राय अपने पुरखो के द्वारा हासिल की गई मुस्लिम और अंग्रेजी शासको तालुकेदार और राय साहब के खिताब से मशहूर आपकी खासी रियासत का मालिकाना हक रखते थे। आपकी जायजाद से हजारो गांव वासियों को रोजी और रोटी मिलती थी। राय साहब के यहाँ लेन देन का कार्यक्रम वहीं पुरानी बुजुर्गी हैसियत पर ही आघारित था।
उनके हितैषी मजदूरो और कर्मचारियों को अचानक ही अगर किसी प्रकार की आपदा का सामना पड़ जाये इस हालत में बड़ी मीन मेख पश्चात पड़ताल पक्के सक्कड़ के सथ पूँजी या अन्य प्रकार की सेवाप्रति जागरूक होते।
पूर्वजो की प्रथा के अनुसार राय खानदान में मजदूरो और बंधुवा मजदूरो की कूछ मजदूरी का अंश आजकल के वायदों पर भुगतान कर बाकी हिसाब नगद के आधार पर प्रत्येक तिहायी में मुहैया कराया जाता था। इस सिलसिले को प्रत्येक व्यक्ति स्वीकार नहीं करता था मगर सांप के सामने दीपक नहीं चलता।

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