सेक्शन थम, आधे दाऐं, आधें बायें बाकी मेंरे पीछे क्विक मार्च!
यह हमारी संस्थागत नीति का एक काबिले-तारीफ नमूना है, साथ संनग्न हम अंगे्रजो के जमाने के जेलर हैं, जब हम नहीं सूधरे हैं तो तुम कैसे सुधरोगे वैगरहा। यह शोले पिक्चर के संवाद जैसे ही कुछ दृश्य और मुहावरे सारे संसार में (शोले जहां भी चली) हर इंसान की जुंबान पर अनायास ही आते गये और आज भी चरितार्थ है।
वास्तव में हम सठिया गये लेकिन हममे भी बचपनापन और सीख ही आज तक किसी पायदान ने मुहैया ही नहीं करवाई जिसकी कि कल से आज और आज से कल को भी जरूरत थी, मगर शायद उन्हे इसकी जरूरत ही नहीं महसूस हुई जो कि इस भारतीयक को आदर्श की नजर से देखने और सुखमय बनाने के स्वप्न दर वचनबद्ध रहें हैं।
वरना क्या उन देशभक्त वीरो शहीदों और महापुरूषों की तस्वीरें सर से ऊपर दिवारों से टाँगकर जोशोकथन और आहवान प्रति जागरूक होकर उनके बताये पथ पर चलकर हमे उनके द्वारा दी सीख पर स्वयं चलकर बताते तो क्या हम आज उस श्रेणी में हाजिर जवाब होते जिसे कि भ्रष्ट राजनीति का दर्जा विश्व आकड़ा भी दे चुका है। और जिससे यह शोले का संवाद बिल्कुल सटीक बैठते हुये हमे प्रतीत हो चुके हैं।
जिस देश के नागरिक को सम्पूर्ण रूप से अपने देश का इतिहास हीन मालूम हो उस देश की नीयत का अंदाजा अणुढ़ भी लगाने में पीछे नहीं रहेगा।
संकेतः कहने को भारतीय है और हमे भारत माँ पर गर्व है मगर भरतीयता पर नहीं, क्यांेकि यह बेजार बस्ती है और इसमे
हम आबाद-ए मरहूम बस्ती में,
मजरूह-ए अमन तलाश सिद्दत हुये,
ख्वाब सारे कसीदों की तरह गुनते रहो
वक्त आखिर नसीबे हाथ खली रूखसते!
धन्यवाद
महावीर फौजी
ग्राम हमीरपुर पो0 भगवन्तनगर
जनपद - उन्नाव (उ0 प्र0)
Monday, January 26, 2009
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